दीपावली व्रत कथा (Diwali Vrat Katha)
दीपावली का पावन पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दीपावली व्रत से जुड़ी कई पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से दो मुख्य कथाएं नीचे दी गई हैं:
१. साहूकार की बेटी और माता लक्ष्मी की कथा
प्राचीन समय में एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने जाती थी। उस पीपल के पेड़ पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने प्रकट होकर साहूकार की बेटी से कहा, “तुम मेरी सहेली बन जाओ।” लड़की ने अपने पिता से पूछकर लक्ष्मी जी से मित्रता कर ली।
एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया। लक्ष्मी जी ने उसे सोने-चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग खिलाए और विदा करते समय मूल्यवान उपहार दिए। जब वह लौटने लगी, तो लक्ष्मी जी ने मुस्कुराकर कहा, “अब तुम मुझे अपने घर कब बुला रही हो?” साहूकार की बेटी ने निमंत्रण तो दे दिया, लेकिन अपनी गरीबी के कारण वह चिंतित हो गई।
जब साहूकार ने बेटी को उदास देखा, तो उसने ढाढस बंधाया और कहा कि तुम घर की साफ-सफाई करो और मिट्टी के चौके को स्वच्छ कर लक्ष्मी जी का ध्यान करो। तभी एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उड़ रही थी, उसने वह हार साहूकार के घर के आंगन में गिरा दिया। साहूकार ने उस हार को बेचकर सुंदर पकवान और सोने की चौकी की व्यवस्था की।
जब माता लक्ष्मी भगवान गणेश के साथ साहूकार के घर आईं, तो वहां की सफाई और भक्ति देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने साहूकार के घर को धन-धान्य और सुख-समृद्धि से भर दिया। तभी से दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा और इस कथा को सुनने की परंपरा चली आ रही है।
२. राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा
दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दानी राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी, तब उन्होंने दो पग में धरती और आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु उनकी दानवीरता से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने वरदान में मांगा कि भगवान विष्णु सदैव उनके साथ पाताल लोक में निवास करें। भगवान अपने भक्त के वचन से बंध गए और पाताल चले गए।
इधर वैकुंठ में माता लक्ष्मी व्याकुल हो गईं। अपने पति को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक में राजा बलि के पास पहुंचीं। कार्तिक मास की अमावस्या के दिन माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधा और उन्हें अपना भाई बनाया। जब राजा बलि ने उपहार देने की इच्छा प्रकट की, तो माता लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में आ गईं और उन्होंने उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लिया। राजा बलि ने सहर्ष अपने भाई का धर्म निभाते हुए विष्णु जी को विदा किया। यह पावन प्रसंग दीपावली के दिन संपन्न हुआ था, इसलिए भी इस दिन लक्ष्मी-नारायण की विशेष आराधना की जाती है।
पूजा विधि: दीपावली के दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की विशेष पूजा की विस्तृत विधि के लिए नीचे देखें:

Diwali Lakshmi Puja Vidhi | दीवाली लक्ष्मी पूजा विधि
दीपावली के शुभ अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की विस्तृत विधि, श्री सूक्तम और लक्ष्मी आरती के साथ।
पढ़ें →(कथा समाप्त)
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