धनतेरस व्रत कथा (Dhanteras Vrat Katha)
धनतेरस का त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वन्तरि, माता लक्ष्मी, कुबेर देव और यमराज की पूजा की जाती है। धनतेरस से जुड़ी दो मुख्य पौराणिक कथाएं हैं:
१. यम दीपदान की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिम के एक पुत्र थे। ज्योतिषियों ने उनकी कुंडली देखकर भविष्यवाणी की थी कि विवाह के ठीक चौथे दिन सर्पदंश से बालक की मृत्यु हो जाएगी। राजा हिम ने अपने पुत्र को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए। जब राजकुमार का विवाह हुआ, तो उनकी पत्नी को इस भविष्यवाणी का पता चला।
विवाह के चौथे दिन, चतुर राजकुमारी ने राजकुमार के शयनकक्ष के बाहर अपने सोने-चांदी के आभूषणों और सिक्कों का ढेर लगा दिया और पूरे महल को अनगिनत दीयों से रोशन कर दिया। वह स्वयं रात भर जागकर राजकुमार को कहानियां सुनाती रही और मधुर गीत गाती रही।
जब मृत्यु के देवता यमराज सर्प का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण हरने आए, तो दीयों और आभूषणों की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वे महल के भीतर प्रवेश नहीं कर पाए और आभूषणों के ढेर पर बैठकर राजकुमारी के मधुर गीत सुनने लगे। इस प्रकार रात बीत गई और राजकुमार के प्राण बच गए। तभी से धनतेरस की रात यमराज के निमित्त दीपदान (यम दीपदान) करने की परंपरा शुरू हुई ताकि अकाल मृत्यु से बचा जा सके।
२. भगवान धन्वन्तरि जन्म की कथा
दूसरी कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। देवताओं और असुरों के बीच चल रहे समुद्र मंथन के दौरान, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे भगवान विष्णु के ही अंश माने जाते हैं और उन्हें आयुर्वेद का जनक तथा देवताओं का वैद्य कहा जाता है।
भगवान धन्वन्तरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही इस दिन को धनतेरस या धनत्रयोदशी के रूप में मनाया जाता है। वे संसार को आरोग्य और दीर्घायु का वरदान देते हैं। इसी मंथन से माता लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं, इसलिए धनतेरस पर लक्ष्मी-नारायण और धन्वन्तरि जी की विशेष पूजा की जाती है।
पूजा विधि: धनतेरस के दिन यम दीपदान और भगवान धन्वन्तरि की पूजा की विस्तृत विधि के लिए नीचे देखें:

Dhanteras Puja Vidhi | धनतेरस पूजा विधि
धनतेरस के दिन यम दीपदान, भगवान धन्वन्तरि और कुबेर देव की पूजा की सरल और संपूर्ण विधि।
पढ़ें →(कथा समाप्त)
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