त्रिपुरोत्सव कथा (देव दीपावली कथा)
कार्तिक मास की पूर्णिमा को देव दीपावली या त्रिपुरोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर काशी में गंगा घाटों पर लाखों दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। इस महापर्व की मुख्य पौराणिक कथा भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर नामक भयानक राक्षस के वध से जुड़ी है।
त्रिपुरासुर का आतंक और वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नाम का एक दैत्य था, जिसका वध भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने किया था। तारकासुर के तीन पुत्र थे—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने और अमर होने के लिए तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। तीनों भाइयों ने अमर होने का वरदान मांगा, परंतु ब्रह्मा जी ने कहा, “मृत्युलोक में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। तुम कोई अन्य वरदान मांगो।”
तब तीनों भाइयों ने बहुत सोच-समझकर वरदान मांगा: “हे प्रभु! आप हमारे लिए तीन अलग-अलग नगरों (पुरों) का निर्माण करवाएं। ये तीनों पुर जब अभिजित नक्षत्र में एक सीधी रेखा में आएं, और कोई अत्यंत शक्तिशाली देवता केवल एक ही बाण से इन तीनों को एक साथ नष्ट करने का प्रयास करे, तभी हमारी मृत्यु हो।” ब्रह्मा जी ने उन्हें यह वरदान दे दिया।
वरदान पाते ही मयदानव ने उनके लिए तीन भव्य नगरों का निर्माण किया—एक सोने का, एक चांदी का और एक लोहे का। इन्हें ही ‘त्रिपुर’ कहा गया और इन तीनों भाइयों को ‘त्रिपुरासुर’। वरदान के मद में चूर होकर त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया।
भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर का वध
त्रस्त होकर सभी देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। सबने मिलकर महादेव से त्रिपुरासुर के संहार की प्रार्थना की। भगवान शिव देवताओं की रक्षा के लिए तैयार हो गए।
इस दिव्य युद्ध के लिए एक विशेष रथ तैयार किया गया:
- पृथ्वी को रथ, सूर्य और चंद्रमा को उसके पहिए बनाया गया।
- सुमेरु पर्वत को धनुष और वासुकी नाग को धनुष की प्रत्यंचा बनाया गया।
- स्वयं भगवान विष्णु उस बाण की नोक बने और अग्नि देव उसकी पूंछ।
जब तीनों पुर (नगर) अभिजित नक्षत्र में एक सीधी रेखा में आए, तब भगवान शिव ने अपने दिव्य धनुष से एक अमोघ बाण छोड़ा। उस बाण ने क्षणभर में तीनों नगरों को जलाकर भस्म कर दिया और त्रिपुरासुर का अंत कर दिया। तीनों लोकों को इस भय से मुक्ति मिली।
देव दीपावली की शुरुआत
त्रिपुरासुर का वध होने की प्रसन्नता में देवताओं ने भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) में आकर दीप प्रज्वलित किए और खुशियां मनाईं। चूंकि देवताओं ने दीप जलाकर यह दीपावली मनाई थी, इसलिए इसे देव दीपावली या त्रिपुरोत्सव कहा गया। तभी से हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान करने और इस पावन कथा को सुनने की परंपरा चली आ रही है।
(कथा समाप्त)
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