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Indrakrit Lakshmi Stotram | इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्रम् - Stotram Bhagwan Bhakti

Indrakrit Lakshmi Stotram | इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्

इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्रम् (Indrakrit Lakshmi Stotram)

पौराणिक कथा के अनुसार, जब महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण देवराज इन्द्र श्रीहीन (धन और वैभव से वंचित) हो गए थे और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था, तब समुद्र मन्थन से माता लक्ष्मी पुनः प्रकट हुईं। उस समय इन्द्र ने माता लक्ष्मी की स्तुति में इस अद्भुत स्तोत्र की रचना की थी। इसके पाठ से इन्द्र को पुनः स्वर्ग का ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। दीपावली पर इसका पाठ अत्यंत मंगलकारी है।

स्तोत्रम्:

नमस्ये सर्वलोकानां जननीं अब्धिसम्भवाम्। श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥१॥

त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी। संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती॥२॥

यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने। आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी॥३॥

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च। सौम्यासौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद् पूरितं अम्बिक॥४॥

का त्वामन्यः सहस्राक्ष स्तौतुं शक्तोऽस्ति भूतले। विष्णुपत्नीं जगन्मातरं सर्वभूतसुखप्रदाम्॥५॥

नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः। कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः॥६॥

पद्मपत्रेक्षणे त्वं च प्रसीद हरिवल्लभे। त्वं मां अवलोकय देवि संकटेषु महाधने॥७॥

त्वं प्रपन्नां आर्तबां रक्ष रक्ष महामते। सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके॥८॥

स्तोत्र का महत्व और लाभ:

जो मनुष्य इस इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र का तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में अथवा दीपावली की रात्रि में भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह कभी श्रीहीन नहीं होता। उसके कुल में सुख-समृद्धि का विस्तार होता है और व्यापारिक बाधाएं दूर होती हैं।

(स्तोत्रम् समाप्त)

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