भगवान धन्वन्तरि स्तोत्रम्
यह स्तोत्र आरोग्य के देवता और भगवान विष्णु के अवतार भगवान धन्वन्तरि की स्तुति में गाया जाता है। इसके नित्य पाठ से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।
स्तोत्रम्:
शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्भिः। सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुकपरिविलसण्मौलिमंभोजनेत्रम्॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारुपीतांबराढ्यम्। वन्दे धन्वन्तरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय। सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रिलोकनाथाय नमः॥
अर्थ:
जिनके चार सुंदर हाथों में शंख, चक्र, जलौका (जोंक) और अमृत कलश है; जो मस्तक पर सुंदर स्वच्छ मुकुट धारण किए हुए हैं और जिनके नेत्र कमल के समान हैं; जिनका शरीर बादलों के समान उज्ज्वल-श्याम वर्ण का है, और जो कमर पर सुंदर पीताम्बर धारण किए हुए हैं, उन समस्त रोगों रूपी वन को भस्म करने वाले दावाग्नि स्वरूप भगवान धन्वन्तरि को मैं नमन करता हूँ।
(स्तोत्रम् समाप्त)
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