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Shri Satyanarayan Vrat Katha | श्री सत्यनारायण व्रत कथा - Vishnu Bhagwan Bhakti

Shri Satyanarayan Vrat Katha | श्री सत्यनारायण व्रत कथा

॥ श्री सत्यनारायण व्रत कथा ॥

यह कथा भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की महिमा का वर्णन करती है। स्कंद पुराण के रेवाखंड के अनुसार, इसमें कुल 5 अध्याय हैं।

प्रथम अध्याय

सूतजी ने नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों से कहा— एक बार नारद जी ने मृत्युलोक में मनुष्यों को कष्ट पाते देख भगवान विष्णु से इसका उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने कहा, “हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए स्वर्ग और मृत्युलोक में एक दुर्लभ व्रत है, जिसे ‘सत्यनारायण व्रत’ कहते हैं। इसे विधि-विधान से करने पर मनुष्य को सुख और अंत में मोक्ष मिलता है।” भगवान ने बताया कि इस व्रत में केले के फल, घी, दूध, और गेहूं के आटे का सवाया (1.25 भाग) प्रसाद बनाकर बंधु-बांधवों के साथ भगवान की पूजा करनी चाहिए।

द्वितीय अध्याय

काशी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण (शतानंद) रहता था। भगवान ने वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे व्रत की विधि बताई। ब्राह्मण ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और धनवान हो गया। एक बार जब वह ब्राह्मण पूजा कर रहा था, तब एक लकड़हारा वहां आया। उसने व्रत के बारे में सुना और संकल्प लिया कि आज लकड़ी बेचकर जो धन मिलेगा, उससे वह भी भगवान का पूजन करेगा। लकड़हारे को दोगुना धन मिला और व्रत के प्रभाव से वह भी सुखी और समृद्ध होकर अंत में बैकुंठ गया।

तृतीय अध्याय

उल्कामुख नाम के एक सत्यवादी राजा थे। एक बार जब वे नदी तट पर व्रत कर रहे थे, तो ‘साधु’ नाम का एक वैश्य (व्यापारी) वहां आया। उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने राजा से व्रत की विधि सीखी और संकल्प किया कि संतान होने पर वह यह व्रत करेगा। समय आने पर उसके घर कन्या (कलावती) का जन्म हुआ, लेकिन उसने अपनी पत्नी लीलावती के बार-बार कहने पर भी व्रत को टाल दिया। उसने कन्या के विवाह के समय भी व्रत नहीं किया। भगवान इस पर रुष्ट हो गए।

चतुर्थ अध्याय

साधु वैश्य अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए रत्नपुर नगर गया। वहां राजा चंद्रकेतु के महल में चोरी हुई और चोरों ने धन वैश्य के पास फेंक दिया। राजा के सैनिकों ने उन्हें बंदी बना लिया। पीछे उनके घर पर भी चोरी हो गई और लीलावती-कलावती दर-दर भटकने लगीं। एक दिन कलावती ने किसी ब्राह्मण के घर सत्यनारायण व्रत होते देखा और प्रसाद ग्रहण किया। घर आकर उसने माँ को बताया। लीलावती ने क्षमा मांगी और व्रत किया। भगवान ने राजा को स्वप्न में आदेश देकर वैश्य और दामाद को मुक्त कराया। मार्ग में एक दंडी स्वामी (भगवान स्वयं) ने उनकी परीक्षा ली, जिसमें वैश्य ने झूठ बोला कि उसकी नाव में केवल पत्ते हैं। उसकी नाव पत्तों से भर गई। वैश्य ने क्षमा मांगी तो भगवान ने सब ठीक कर दिया।

पंचम अध्याय

सूतजी ने आगे बताया— तुंगध्वज नाम का एक राजा था, जिसने वन्य पशुओं का शिकार करने के बाद देखा कि कुछ ग्वाले भक्ति भाव से भगवान का पूजन कर रहे हैं। अहंकारवश राजा ने न तो भगवान को नमस्कार किया और न ही ग्वालों द्वारा दिया गया प्रसाद लिया। इसके कारण राजा के सभी पुत्र नष्ट हो गए और उसका सारा धन-धान्य समाप्त हो गया। राजा को अपनी गलती समझ आई। वह पुनः ग्वालों के पास गया, विधिपूर्वक पूजा की और प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से उसका सब कुछ वापस मिल गया और वह अंत में स्वर्गलोक गया।

(कथा समाप्त)

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