दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
चौपाई
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या देहु मोही॥ तुम समान नहीं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननी जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥ तुम ही हो सब घट घट वासी। तुम ही हो सब सुख की रासी॥
तुम ही हो सब जग की माता। तुम ही हो सब जग की दाता॥ तुम ही हो सब जग की पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥
तुम ही हो सब जग की हितकारी। तुम ही हो सब जग की दुखहारी॥ तुम ही हो सब जग की विधाता। तुम ही हो सब जग की सुखदाता॥
नारायण तुम हो अविनाशी। घट-घट के तुम हो सुखरासी॥ जो कोई तुम्हारा ध्यान लगावै। मन वांछित फल सो जन पावै॥
तुम ही हो सब जग के दाता। तुम ही हो सब जग के विधाता॥ तुम ही हो सब जग के पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥
तुम ही हो सब जग के सहाई। तुम ही हो सब जग के सुखदाई॥ तुम ही हो सब जग के हितकारी। तुम ही हो सब जग के दुखहारी॥
दोहा
लक्ष्मी चालीसा जो पढ़ै, प्रेम सहित मन लाय। सकल मनोरथ सिद्ध हों, संकट दूर नशाय॥
(लक्ष्मी चालीसा समाप्त)
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