श्री गंगा चालीसा
दोहा
जय जय जननी जगदम्बिका, गंगा पतित पावनि। विमल तरंगिणी मां कृपा, करहु सब दुख नावनि॥
चौपाई
जय जय जय Ganga महारानी। जय भागीरथी सुरधनि कल्याणी॥ जो जन तुमको नित प्रति ध्यावै। सो नर परम मोक्ष पद पावै॥
विधि के कमंडल से तुम आईं। हरि के चरण कमल लपटाईं॥ जटा शंभु की मुकुट सुहाई। भागीरथ की तपस्या लाईं॥
सगर के साठ हजार सुत तारे। पतित पावन सब जग विस्ताैरे॥ जगत जननी तुम देव सरित माता। सुमिरत ही सब संकट नश जाता॥
जो नर श्रद्धा सहित नहावै। सब जनम के पाप नशावै॥ त्रिविध ताप मिटे दुःख भारी। जय जय जय गंगा भयतारी॥
गंगा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परम पद पावै॥
दोहा
मां गंगा की कृपा से, मिटे सकल संताप। मनवांछित फल देत हैं, नाशत सब विध पाप॥
(चालीसा समाप्त)
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