॥ संतोषी माता व्रत कथा ॥
प्राचीन काल में एक बुढ़िया थी, जिसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाऊ थे, जबकि सातवां निकम्मा था। बुढ़िया अपने छह बेटों को अच्छा भोजन कराती और सातवें को उनकी बची हुई जूठन खिलाती थी। एक दिन सातवें बेटे को यह सच पता चला। उसे बहुत दुख हुआ और वह धन कमाने की इच्छा लेकर परदेस चला गया।
वहां वह एक दयालु सेठ के यहाँ काम करने लगा और अपनी मेहनत से बड़ा व्यापारी बन गया। पीछे उसकी पत्नी पर उसके भाइयों और देवरानियों ने बहुत अत्याचार किए। वह जंगल से लकड़ियां काटकर लाती और उसी से अपना गुजारा करती। एक दिन उसने कुछ महिलाओं को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उसने भी 16 शुक्रवार का व्रत करने का संकल्प लिया।
माता की कृपा से उसके पति को उसकी याद आई और वह बहुत सारा धन लेकर वापस लौटा। उसने अपनी पत्नी के लिए अलग महल बनवाया। व्रत के समापन (उद्यापन) के दिन कुछ बच्चों ने खटाई खा ली, जिससे माता रुष्ट हो गईं और उसके पति को राजा के सैनिकों ने पकड़ लिया। पत्नी ने पुनः माता से क्षमा मांगी और संकल्प किया। माता प्रसन्न हुईं, पति छूट गया और उनके घर में सुख-संपत्ति का वास हुआ।
ध्यान रहे: संतोषी माता के व्रत में खटाई खाना सख्त मना है।
(कथा समाप्त)
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