दोहा
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग। पद्मासन स्थित ध्याइये, सूर्य देव सुख रङ्ग॥
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर। सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिर हर॥ भानु पतङ्ग मरीचि प्रभाकर। सविता हंस अहस्कर भास्कर॥
अन्धकार नाशक जग स्वामी। घट-घट के तुम अन्तर्यामी॥ जो कोई तुम्हारा ध्यान लगावै। मन वांछित फल सो जन पावै॥
अन्धहिं आँख देत सुख भारी। कोढ़िन काय मिटावत सारी॥ बाँझहिं पुत्र देत गुणशाला। निर्धन को धन देत विशाला॥
निश्चय प्रेम प्रतीति जो ध्यावै। सुख सम्पति नाना फल पावै॥ विमल विवेक बुद्धि सब होई। जो यह पाठ करै नित कोई॥
तुम ही हो सब जग के दाता। तुम ही हो सब जग के विधाता॥ तुम ही हो सब जग के पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥
तुम ही हो सब जग के सहाई। तुम ही हो सब जग के सुखदाई॥ तुम ही हो सब जग के हितकारी। तुम ही हो सब जग के दुखहारी॥
दोहा
भानु चालीसा जो पढ़ै, प्रेम सहित मन लाय। सकल मनोरथ सिद्ध हों, संकट दूर नशाय॥
(सूर्य चालीसा समाप्त)
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