दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
चौपाई
जय जय श्री शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥ चारि भुजा, तन श्याम बिराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥ कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल में करैं अरि दल संहारा॥ पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन॥
सौरि, मन्द, शनि, दश नाम तुम्हारे। सकल जगत के तुम रखवारे॥ जो कोई तुम्हारा ध्यान लगावै। मन वांछित फल सो जन पावै॥
अन्धहिं आँख देत सुख भारी। कोढ़िन काय मिटावत सारी॥ बाँझहिं पुत्र देत गुणशाला। निर्धन को धन देत विशाला॥
निश्चय प्रेम प्रतीति जो ध्यावै। सुख सम्पति नाना फल पावै॥ विमल विवेक बुद्धि सब होई। जो यह पाठ करै नित कोई॥
दोहा
शनि चालीसा जो पढ़ै, प्रेम सहित मन लाय। सकल मनोरथ सिद्ध हों, संकट दूर नशाय॥
(शनि चालीसा समाप्त)
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