दोहा
बन्दौं सन्तोषी चरण, जगजननी सुखधाम। हृदय बसहु अब मातु तुम, पूरण कीजै काम॥
चौपाई
जय सन्तोषी मातु भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥ श्री गणपति की तुम हो लाली। सब जग की तुम हो प्रतिपाली॥
शुक शक्र ब्रह्मादिक ध्यावें। नारद शारद शीश नवावें॥ तुम ही हो सब जग की माता। तुम ही हो सब जग की दाता॥
तुम ही हो सब जग की पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥ तुम ही हो सब जग की हितकारी। तुम ही हो सब जग के दुखहारी॥
तुम ही हो सब जग की विधाता। तुम ही हो सब जग की सुखदाता॥ जो कोई तुम्हारा ध्यान लगावै। मन वांछित फल सो जन पावै॥
तुम ही हो सब जग के दाता। तुम ही हो सब जग के विधाता॥ तुम ही हो सब जग के पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥
तुम ही हो सब जग के सहाई। तुम ही हो सब जग के सुखदाई॥ तुम ही हो सब जग के हितकारी। तुम ही हो सब जग के दुखहारी॥
तुम ही हो सब जग की विधाता। तुम ही हो सब जग की सुखदाता॥
दोहा
सन्तोषी माता की जय, कहो प्रेम से आज। सकल मनोरथ सिद्ध हों, पूरे हो सब काज॥
(संतोषी माता चालीसा समाप्त)
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