दोहा
जय काली कलिकाल की, जय जय जय महामाय। अभय दान दीजै मोही, शरण गहे की आय॥
चौपाई
जय जय जय काली महारानी। महिमा अमित न जात बखानी॥ तुम ही हो सब जग की माता। तुम ही हो सब जग की दाता॥
तुम ही हो सब जग की पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥ तुम ही हो सब जग की हितकारी। तुम ही हो सब जग की दुखहारी॥
तुम ही हो सब जग की विधाता। तुम ही हो सब जग की सुखदाता॥ जो कोई तुम्हारा ध्यान लगावै। मन वांछित फल सो जन पावै॥
तुम ही हो सब जग के दाता। तुम ही हो सब जग के विधाता॥ तुम ही हो सब जग के पालन। तुम ही हो सब दुख के निवारण॥
तुम ही हो सब जग के सहाई। तुम ही हो सब जग के सुखदाई॥ तुम ही हो सब जग के हितकारी। तुम ही हो सब जग के दुखहारी॥
तुम ही हो सब जग की विधाता। तुम ही हो सब जग की सुखदाता॥ नारायण तुम हो अविनाशी। घट-घट के तुम हो सुखरासी॥
दोहा
काली चालीसा जो पढ़ै, प्रेम सहित मन लाय। सकल मनोरथ सिद्ध हों, संकट दूर नशाय॥
(काली चालीसा समाप्त)
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