॥ आरती (भैरव) — भैरव स्वरूपित ॥
भैरव झूमे गान गा, संकट हर सत्कार।
जय भैरव, जय भैरव, त्रिपुरारी भैरव हितकार। शिव-सदाशिव भक्तवत्सल, कलेश्वर दुःख हारा। कण्ठ में नाग, कटि में खड्ग, डमरू हृदय में धारा।। वृन्दावन वृक्ष-धर, भीमसेन वीर शरणदाता। काल के पाश, पापहर भीतर, धैर्य तथा भक्ति साक्षी।। जय भैरव, जय भैरव, शाप हरता सब संकल्प। चरण कमल में अर्पित दीप, भक्ति सहित स्तुति अनुष्ठित।।
(आरती समाप्त)
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